निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥
nihatya dhārtarāṣṭrānnaḥ kā prītiḥ syājjanārdana |pāpamevāśrayedasmānhatvaitānātatāyinaḥ ||
हे जनार्दन, धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें कौन-सी प्रसन्नता मिलेगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें केवल पाप ही लगेगा।
व्याख्या
शोक से व्याकुल अर्जुन कृष्ण से कहता है कि धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने से कोई सुख नहीं मिलेगा। वह उन्हें आततायी कहता है, जिन्हें धर्मशास्त्र वध के योग्य मानते हैं, फिर भी उसे डर है कि उन्हें मारने से पाप लगेगा। कुछ टीकाकार इसे शास्त्र-नियम और ऊँचे कर्तव्य के बीच तौल मानते हैं, तो कुछ इसे भावनाओं से धुँधली हुई सोच मानते हैं।