हे मधुसूदन! ये लोग मुझे मार भी डालें, तब भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता — तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं, फिर इस पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या?
व्याख्या
अपने गुरुजनों और संबंधियों को विरोधी पक्ष में देखकर शोक से भरे अर्जुन कृष्ण (मधुसूदन, मधु दैत्य के संहारक) से कहते हैं कि वे इन्हें मारना नहीं चाहते। चाहे ये लोग अर्जुन को ही मार डालें, और चाहे बदले में तीनों लोकों का राज्य मिलता हो, तब भी नहीं; फिर इस पृथ्वी के राज्य की तो बात ही क्या। यहीं से कर्तव्य (धर्म) और पारिवारिक संबंधों के बीच उनका नैतिक संकट शुरू होता है।