कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥
kathaṃ na jñeyamasmābhiḥ pāpādasmānnivartitum |kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ prapaśyadbhirjanārdana ||
परन्तु हे जनार्दन, जब हम कुल के नाश से उत्पन्न होने वाले दोष को स्पष्ट देख रहे हैं, तो हमें इस पाप से पीछे हटने की समझ क्यों न होनी चाहिए?
व्याख्या
अर्जुन अपना तर्क आगे बढ़ा रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने कहा कि लोभ से भ्रमित कौरव कुल-नाश और मित्र-द्रोह का दोष नहीं देखते। यहाँ वे कहते हैं कि हम तो यह दोष देख रहे हैं, इसलिए हमें इस पाप से बचना चाहिए। जनार्दन श्रीकृष्ण का एक नाम है।