यदि शस्त्र हाथ में लिए धृतराष्ट्र के पुत्र युद्ध में मुझे मार डालें, जबकि मैं न तो प्रतिकार करूँ और न ही मेरे हाथ में कोई शस्त्र हो, तो वह मेरे लिए कहीं अधिक कल्याणकारी होगा।
व्याख्या
अपने ही स्वजनों से युद्ध करने की सोचकर शोक में डूबे अर्जुन पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ाते हैं, जहाँ उन्होंने इस हिंसा को भारी पाप कहा था। अब वे कहते हैं कि निहत्थे और बिना प्रतिकार के धृतराष्ट्र के पुत्रों (कौरवों) के हाथों मारा जाना उन्हें मारने से बेहतर होगा। यही उनके मन की उलझन है, जिसके कारण अगले श्लोक में वे धनुष रख देते हैं।