हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥
hanta te kathayiṣyāmi divyā hyātmavibhūtayaḥ |prādhānyataḥ kuruśreṣṭha nāstyanto vistarasya me ||
ठीक है, हे कुरुश्रेष्ठ! मैं तुम्हें अपनी दिव्य विभूतियाँ बताऊँगा, पर केवल प्रमुख-प्रमुख ही, क्योंकि मेरे विस्तार का कोई अंत नहीं है।
व्याख्या
अर्जुन ने अभी कृष्ण से उनकी विभूतियों का विस्तार से वर्णन करने को कहा है, इसलिए कृष्ण सहमत होते हैं। वे कहते हैं कि केवल प्रमुख विभूतियाँ ही बताएँगे, क्योंकि उनके विस्तार का अंत नहीं है। अगले श्लोकों में इन्हीं के उदाहरण आते हैं, जिनकी शुरुआत सब प्राणियों में आत्मा के रूप में कृष्ण से होती है।