मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
maccittā madgataprāṇā bodhayantaḥ parasparam |kathayantaśca māṃ nityaṃ tuṣyanti ca ramanti ca ||
मुझमें चित्त लगाए हुए और मुझमें ही प्राणों को समर्पित किए हुए वे आपस में एक-दूसरे को बोध कराते हैं और सदा मेरी ही चर्चा करते रहते हैं। इसी से वे संतुष्ट रहते हैं और आनंदित होते हैं।
व्याख्या
कृष्ण पिछले श्लोक में बताए गए उन ज्ञानी भक्तों का वर्णन जारी रखते हैं, जो उन्हें सबका उद्गम जानकर भजते हैं। उनका चित्त और प्राण (जीवन-शक्ति) उन्हीं की ओर लगे रहते हैं, और वे आपस में बोध बाँटकर तथा उनकी चर्चा करके तृप्ति पाते हैं। कुछ व्याख्याकार "मद्गतप्राणा" का अर्थ पूरा जीवन उन्हें अर्पित कर देना मानते हैं, जबकि अन्य इस साझा चर्चा को ही एक स्वतंत्र साधना के रूप में महत्त्व देते हैं।