अर्जुन
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥
kathaṃ vidyāmahaṃ yogiṃstvāṃ sadā paricintayan | keṣu keṣu ca bhāveṣu cintyo'si bhagavanmayā ||
हे योगी! मैं सदा आपका चिंतन करते हुए आपको कैसे जानूँ? और हे भगवन्! मुझे किन-किन भावों में आपका चिंतन करना चाहिए?
व्याख्या अर्जुन ने अभी कृष्ण से उनकी दिव्य विभूतियाँ बताने की प्रार्थना की है। यहाँ वह पूछता है कि निरंतर ध्यान करते हुए वह उन्हें कैसे पहचाने, और किन-किन वस्तुओं या रूपों में उनका चिंतन करे। 'योगिन्' का अर्थ है योग (साधना और परमात्मा से मिलन) में सिद्ध, यानी योग की शक्ति के स्वामी।
पिछला श्लोक 10.16 अध्याय 10 · ईश्वर की विभूतियाँ अगला श्लोक 10.18
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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