अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः ॥
akṣarāṇāmakāro'smi dvandvaḥ sāmāsikasya ca |ahamevākṣayaḥ kālo dhātā'haṃ viśvatomukhaḥ ||
अक्षरों में मैं अकार हूँ, और समासों में द्वन्द्व समास हूँ। मैं ही कभी न घटने वाला काल हूँ, और मैं ही सब ओर मुख वाला धाता (धारण करने वाला) हूँ।
व्याख्या
अर्जुन के प्रश्न पर कृष्ण अपनी दिव्य विभूतियाँ गिना रहे हैं। अकार संस्कृत की सबसे पहली और मूल ध्वनि है, और द्वन्द्व समास वह है जिसमें शब्द बराबर के स्तर पर जुड़ते हैं (जैसे "माता-पिता")। वे अनंत काल भी हैं और सब दिशाओं में मुख वाले धाता भी, जिसे टीकाकार प्रायः ब्रह्मा या सबका पालन और निरीक्षण करने वाले परमेश्वर के रूप में समझते हैं।