श्रीकृष्ण
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप । एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥
nānto'sti mama divyānāṃ vibhūtīnāṃ paraṃtapa | eṣa tūddeśataḥ prokto vibhūtervistaro mayā ||
हे परंतप, मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है। मैंने अपनी विभूति का यह विस्तार तो तुम्हें केवल संक्षेप में, संकेत भर के रूप में बताया है।
व्याख्या इस अध्याय में अपनी विभूतियों का लंबा वर्णन करने के बाद कृष्ण उसे समेटते हैं। वे अर्जुन से कहते हैं कि उनकी दिव्य विभूतियाँ अनंत हैं और अब तक बताए गए उदाहरण केवल संक्षिप्त सार हैं। भाव यह है कि कोई सूची ईश्वर की पूर्णता को नहीं समेट सकती।
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भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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