यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
yo māmajamanādiṃ ca vetti lokamaheśvaram |asammūḍhaḥ sa martyeṣu sarvapāpaiḥ pramucyate ||
जो मुझे अजन्मा, अनादि और समस्त लोकों का महान ईश्वर जानता है, वह मनुष्यों में मोहरहित है और सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी कहा कि देवता और महर्षि भी उनकी उत्पत्ति नहीं जानते, क्योंकि वे ही सबके आदि कारण हैं। यहाँ वे कहते हैं कि जो उन्हें अजन्मा (अज), अनादि और लोकों का महान ईश्वर (लोकमहेश्वर) जानता है, वह मोह (सम्मोह) से मुक्त होकर सब पापों से छूट जाता है। परंपराएँ इस ज्ञान को अलग ढंग से समझती हैं: कुछ इसे सगुण ईश्वर की भक्तिपूर्ण अनुभूति मानती हैं, तो कुछ सब कुछ के पीछे स्थित परम तत्त्व का बोध।