रुद्रों में मैं शंकर हूँ; यक्षों और राक्षसों में धन का स्वामी (कुबेर) हूँ। वसुओं में मैं अग्नि हूँ, और पर्वतों में मैं मेरु हूँ।
व्याख्या
अपनी विभूतियों की सूची जारी रखते हुए कृष्ण हर वर्ग में सबसे श्रेष्ठ को अपना रूप बताते हैं: रुद्रों में शंकर (शिव), यक्ष-राक्षसों में धनपति कुबेर, वसुओं में अग्नि और पर्वतों में मेरु। भाव यह है कि हर श्रेणी में जो सबसे उत्कृष्ट है, वह उनकी ही शक्ति का प्रकाश है। 'वित्तेश' का अर्थ धन का स्वामी है, जिसे परंपरा में कुबेर माना गया है।