श्रीकृष्ण
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥
ahiṃsā samatā tuṣṭistapo dānaṃ yaśo'yaśaḥ | bhavanti bhāvā bhūtānāṃ matta eva pṛthagvidhāḥ ||
अहिंसा, समभाव, संतोष, तप, दान, यश और अपयश — प्राणियों के ये अनेक प्रकार के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
व्याख्या पिछले श्लोक में गिनाए गए प्राणियों के अच्छे-बुरे गुणों और अवस्थाओं की सूची को कृष्ण आगे बढ़ाते हैं। यहाँ वे अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, यश और अपयश का नाम लेते हैं। वे कहते हैं कि ये सभी भिन्न-भिन्न भाव उन्हीं से उत्पन्न होते हैं, और यहीं से इस अध्याय में उनकी दिव्य विभूतियों का वर्णन आगे बढ़ता है।
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भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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