एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥
etāṃ vibhūtiṃ yogaṃ ca mama yo vetti tattvataḥ |so'vikampena yogena yujyate nātra saṃśayaḥ ||
जो मनुष्य मेरी इस विभूति और मेरे योग को तत्त्व से जान लेता है, वह अटल योग से मुझसे जुड़ जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि महर्षि और मनु उनसे उत्पन्न हुए और उन्हीं से सब प्राणी आए। यहाँ वे कहते हैं कि जो उनकी विभूति (महिमा) और योग (दिव्य सामर्थ्य) को सचमुच जान लेता है, वह स्थिर रूप से उनसे जुड़ जाता है। टीकाकार "योग" का अर्थ उनकी सृजन-शक्ति, ऐश्वर्य या भक्ति-साधना बताते हैं, पर सब मानते हैं कि यह ज्ञान सच्चा और अनुभव का होना चाहिए।