न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥
na me viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṃ na maharṣayaḥ |ahamādirhi devānāṃ maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥ ||
न देवगण मेरे उद्भव को जानते हैं और न महर्षि, क्योंकि मैं ही सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का आदि कारण हूँ।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से अपने परम स्वरूप की बात आगे बढ़ाते हैं। वे कहते हैं कि देवता और महर्षि भी उनके उद्भव (प्रभव) को पूरी तरह नहीं जानते, क्योंकि वे स्वयं उन्हीं से उत्पन्न हुए हैं। भक्ति परंपराएँ कृष्ण को परम पुरुष मानकर इसे पढ़ती हैं, जबकि अद्वैत परंपरा उन्हें सबके पीछे की एक ही सत्ता के रूप में देखती है।