सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।न हि ते भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥
sarvametadṛtaṃ manye yanmāṃ vadasi keśava |na hi te bhagavan vyaktiṃ vidurdevā na dānavāḥ ||
हे केशव, आप मुझसे जो कुछ कह रहे हैं, यह सब मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्, आपके प्रकट स्वरूप को न देवता जानते हैं और न दानव ही।
व्याख्या
पिछले श्लोक में अर्जुन ने नारद, असित, देवल और व्यास जैसे ऋषियों का नाम लिया, जो कृष्ण की महिमा बताते हैं। अब वे कहते हैं कि कृष्ण की विभूतियों के बारे में जो कुछ उन्होंने सुना, उसे वे सत्य (ऋत) मानते हैं, और यह भी कि कृष्ण के स्वरूप (व्यक्ति) को देवता और दानव भी पूरी तरह नहीं जानते। 'व्यक्ति' का अर्थ कुछ टीकाकार 'प्रकट होना' लेते हैं और कुछ 'वास्तविक स्वरूप'; दोनों का भाव यही है कि वह देवताओं और दानवों की समझ से भी परे है।