जिसे वेद के जानने वाले अविनाशी (अक्षर) कहते हैं, जिसमें आसक्ति से मुक्त संयमी साधक प्रवेश करते हैं, और जिसे पाने की इच्छा से लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं — उस पद को मैं तुम्हें संक्षेप में बताऊँगा।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को उस लक्ष्य के बारे में संक्षेप में बताने की भूमिका बाँधते हैं, जिसे पिछले श्लोक में परम दिव्य पुरुष कहा गया था। वे उसे अविनाशी (अक्षर) कहते हैं: वेद के ज्ञाता उसे यही नाम देते हैं, आसक्ति से मुक्त (वीतराग) संयमी उसमें प्रवेश करते हैं, और उसे पाने की इच्छा से साधक ब्रह्मचर्य अर्थात् संयम का पालन करते हैं। परंपराएँ अलग-अलग मानती हैं कि यहाँ अक्षर का अर्थ निराकार ब्रह्म है या कृष्ण का अपना परम स्वरूप; आगे के श्लोक उसे पाने का मार्ग बताते हैं।