वेदों के पाठ में, यज्ञों में, तपस्याओं में और दानों में जो पुण्यफल बताया गया है, योगी इसे जानकर उस सबसे आगे निकल जाता है और परम तथा आदि स्थान को प्राप्त होता है।
व्याख्या
अर्जुन को पिछले श्लोक में हर समय योग में स्थिर रहने को कहने के बाद, कृष्ण यहाँ इस अध्याय की शिक्षा का फल बताते हैं। योगी वह साधक है जिसका मन निरंतर परमात्मा से जुड़ा रहता है। पुण्यफल का अर्थ शुभ कर्मों से मिलने वाला फल है, और योगी उससे ऊपर उठकर परम धाम पाता है। 'इसे जानकर' को कुछ परंपराएँ दो मार्गों के ज्ञान के रूप में समझती हैं, और कुछ इस अध्याय में बताए गए परम तत्त्व के ज्ञान के रूप में।