जो अविनाशी और परम है, वह ब्रह्म है; प्राणी का अपना मूल स्वभाव अध्यात्म कहलाता है। और जो सृजन-क्रिया (विसर्ग) प्राणियों के अस्तित्व को उत्पन्न करती है, उसे कर्म कहा जाता है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ अर्जुन के अध्याय के आरंभ में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देना शुरू करते हैं, जिनमें उसने ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म के बारे में पूछा था। ब्रह्म (परम सत्य) अविनाशी है; स्वभाव, यानी अपनी मूल प्रकृति, अध्यात्म कहलाता है, जिसे अद्वैत परंपरा अंतरात्मा के रूप में स्थित ब्रह्म मानती है और अन्य परंपराएँ जीव की अपनी देहगत प्रकृति। यहाँ कर्म का अर्थ विसर्ग है, यानी वह उत्सर्ग या आहुति-रूप सृजन-क्रिया जिससे प्राणी उत्पन्न होते हैं; टीकाकार इसे यज्ञ-आहुति या व्यापक सृजन-प्रक्रिया, दोनों रूपों में समझाते हैं।