अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥
adhiyajñaḥ kathaṃ ko'tra dehe'sminmadhusūdana |prayāṇakāle ca kathaṃ jñeyo'si niyatātmabhiḥ ||
हे मधुसूदन, इस देह में अधियज्ञ कौन है, और वह कैसे है? और मृत्यु के समय संयमी चित्त वाले लोग आपको कैसे जान पाते हैं?
व्याख्या
अर्जुन पिछले श्लोक में शुरू किए गए प्रश्नों को पूरा करता है। वह पूछता है कि 'अधियज्ञ' (यज्ञ का अधिष्ठाता) कौन है, और संयमी चित्त वाले (नियतात्मा) लोग मृत्यु के समय (प्रयाणकाल) कृष्ण को कैसे जान सकते हैं। कृष्ण अगले श्लोकों में उत्तर देते हैं और 8.4 में कहते हैं कि देह में स्थित वे स्वयं ही अधियज्ञ हैं। टीकाकार इसका अर्थ अलग-अलग लगाते हैं: कुछ इसे सब यज्ञों के अधिष्ठाता देवता विष्णु के रूप में समझते हैं, तो कुछ देह के भीतर अंतरात्मा के रूप में विराजमान भगवान के रूप में।