जो उस सर्वज्ञ, पुरातन, सबके नियंता, अणु से भी सूक्ष्म, सबके धारणकर्ता, अचिन्त्य रूप वाले, सूर्य के समान प्रकाशमान और अंधकार से परे पुरुष का स्मरण करता है…
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि परम सत्ता का स्मरण कैसे किया जाए, खासकर मृत्यु के समय। वे उसे सर्वज्ञ (कवि), पुरातन शासक, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, सबका आधार और अंधकार (तमस्, अर्थात् अज्ञान) से परे सूर्य-जैसा प्रकाशमान बताते हैं। यह वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है, जहाँ ऐसे साधक की प्राप्ति बताई गई है। अद्वैत परंपरा इसे निराकार ब्रह्म का ईश्वर-रूप में वर्णन मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे साकार भगवान कृष्ण या विष्णु का वर्णन मानती हैं।