avyakto'kṣara ityuktastamāhuḥ paramāṃ gatim |yaṃ prāpya na nivartante taddhāma paramaṃ mama ||
जो अव्यक्त है, उसे 'अक्षर' कहा गया है; उसी को वे परम गति कहते हैं। जिसे पाकर लोग फिर लौटकर नहीं आते, वही मेरा परम धाम है।
व्याख्या
पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ाते हुए कृष्ण जन्म-मृत्यु के चक्र से परे की परम सत्ता का वर्णन करते हैं। वे उसे अव्यक्त और अक्षर (जो नष्ट नहीं होता) कहते हैं, और कहते हैं कि वहाँ पहुँचकर कोई पुनर्जन्म में नहीं लौटता। इसे वे अपना परम धाम कहते हैं। परंपराओं में मतभेद है कि यह धाम निर्गुण ब्रह्म है या कृष्ण का अपना व्यक्तिगत लोक।