जो व्यक्ति एकाक्षर ब्रह्म "ॐ" का उच्चारण करते हुए और मेरा स्मरण करते हुए देह त्यागकर प्रयाण करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में बताई गई योग-साधना के क्रम में कृष्ण यहाँ मृत्यु के समय की स्थिति बता रहे हैं। ॐ (प्रणव) एक अक्षर का वह नाद है जो ब्रह्म, यानी परम सत्य का प्रतीक है; उसका उच्चारण और कृष्ण का स्मरण साथ-साथ करना है। ऐसा साधक परम गति (परमा गति) पाता है। टीकाकारों में मतभेद है कि "मुझे" का अर्थ साकार ईश्वर है या ॐ द्वारा सूचित निराकार ब्रह्म।