मृत्यु के समय जो अडिग मन से, भक्ति से युक्त होकर और योग के बल से अपने प्राण को भौंहों के बीच भली-भाँति स्थिर कर लेता है, वह उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।
व्याख्या
अर्जुन ने पूछा था कि मृत्यु के समय भगवान का स्मरण कैसे हो सकता है। कृष्ण उसी का उत्तर दे रहे हैं, और यह श्लोक पिछले श्लोक का वाक्य पूरा करता है, जिसमें सर्वधारक, सूर्य के समान तेजस्वी, पुराण पुरुष के ध्यान की बात है। यहाँ कहा गया है कि भक्ति और योग के अभ्यास (यानी स्थिर ध्यान-साधना) से मनुष्य प्राण और ध्यान को भौंहों के बीच टिकाकर परम पुरुष को पाता है। कुछ परंपराएँ इसे प्राणायाम की साधना के रूप में शाब्दिक रूप से लेती हैं, जबकि अन्य परंपराएँ भक्ति और निरंतर स्मरण पर ही ज़ोर देती हैं।