जो महात्मा परम सिद्धि को प्राप्त कर चुके हैं, वे मुझे पाकर फिर उस पुनर्जन्म को नहीं पाते, जो दुःख का घर है और अनित्य है।
व्याख्या
कृष्ण पिछले श्लोक में बताए गए निरंतर स्मरण करने वाले योगी की बात आगे बढ़ाते हैं। जो महात्मा (महात्मानः) परम सिद्धि पाकर कृष्ण तक पहुँचते हैं, वे फिर जन्म नहीं लेते; पुनर्जन्म को कृष्ण दुःख का घर और अनित्य कहते हैं। इस प्राप्ति को परंपराएँ अलग ढंग से समझती हैं, जैसे भगवान से मिलन या एक आत्मा का बोध, पर सभी इसे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मानती हैं।