हे पार्थ, जो अनन्य चित्त से सदा और निरंतर मेरा स्मरण करता है, उस नित्य योग में लगे योगी के लिए मैं सुलभ हूँ।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन (पार्थ, पृथा/कुंती के पुत्र) से कहते हैं कि मृत्यु के समय स्मरण तभी सहज होता है जब जीवन भर उसका अभ्यास किया जाए। जिसका मन किसी और ओर नहीं जाता (अनन्यचेताः) और जो निरंतर स्मरण करता है, वह योग (साधना और ईश्वर से मिलन) में स्थिर हो जाता है, और उसके लिए कृष्ण सुलभ हैं। भक्ति परंपराएँ इसे साकार भगवान के प्रेमपूर्ण स्मरण के रूप में पढ़ती हैं, जबकि अद्वैत परंपरा इसे परम आत्मा के निरंतर ध्यान के रूप में देखती है।