हे कौन्तेय, अंत समय में शरीर छोड़ते हुए मनुष्य जिस-जिस भाव का स्मरण करता है, वह उसी-उसी भाव को प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव में रमा रहा होता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि अंत समय में उनका स्मरण करने वाला उन्हीं को पाता है। यहाँ वे उसी बात को सामान्य नियम के रूप में कहते हैं, और अर्जुन को संबोधित करते हैं। "तद्भावभावित" का अर्थ है जीवन भर जिस भाव का चिंतन किया, उसी से मन का ढल जाना, इसलिए अंतिम स्मरण आमतौर पर जीवन भर की आदत से बनता है। कुछ परंपराएँ इसे मुख्यतः जीवन भर के अभ्यास का फल मानती हैं, जबकि कुछ अंतिम क्षण के स्मरण की निर्णायक भूमिका पर अधिक बल देती हैं।