भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥
bhūtagrāmaḥ sa evāyaṃ bhūtvā bhūtvā pralīyate |rātryāgame'vaśaḥ pārtha prabhavatyaharāgame ||
हे पार्थ, प्राणियों का यही समूह बार-बार जन्म लेकर रात्रि आने पर विवश होकर लीन हो जाता है और दिन आने पर फिर प्रकट हो उठता है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण ब्रह्मा के दिन और रात का वर्णन आगे बढ़ा रहे हैं, जो पिछले श्लोक में शुरू हुआ था। वे कहते हैं कि प्राणियों का यही समूह (भूतग्राम) बार-बार रचा और लीन होता है, और इस चक्र पर उसका कोई वश (अवश) नहीं चलता। भाव यह है कि ऊँचे लोक भी आवर्ती काल से बँधे हैं; इससे अगले श्लोक में बताए गए परम, अपरिवर्तनीय तत्त्व की भूमिका बनती है।