हे पार्थ, वह परम पुरुष केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है। सब प्राणी उसी के भीतर स्थित हैं, और उसी से यह सारा जगत व्याप्त है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से पिछले श्लोक में बताए गए परम लक्ष्य, यानी अव्यक्त और अक्षर परमधाम, के बारे में कह रहे हैं। वे बताते हैं कि वह परम पुरुष अनन्य भक्ति, यानी किसी और की ओर न बँटी हुई भक्ति, से प्राप्त होता है। वे यह भी कहते हैं कि सब प्राणी उसी में स्थित हैं और वही सबमें व्याप्त है। परंपराएँ इसे अलग ढंग से पढ़ती हैं: कुछ इसमें साकार ईश्वर पर बल देखती हैं, तो कुछ सर्वव्यापी परम तत्त्व पर।