अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥
antakāle ca māmeva smaranmuktvā kalevaram |yaḥ prayāti sa madbhāvaṃ yāti nāstyatra saṃśayaḥ ||
अंत समय में जो मनुष्य केवल मुझे ही स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे भाव को प्राप्त होता है — इसमें कोई संदेह नहीं है।
व्याख्या
अर्जुन ने पूछा था कि मृत्यु के समय भगवान को कैसे जाना जाए। पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या पूरी करके कृष्ण अब इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए मृत्यु के क्षण की बात करते हैं। जो अंत समय में केवल कृष्ण का स्मरण करते हुए देह छोड़ता है, वह उनके भाव (मद्भाव) को, यानी उनके स्वरूप को पाता है। इस "भाव" को कुछ परंपराएँ परमात्मा में लीन होना मानती हैं, तो कुछ कृष्ण के धाम और स्वरूप की प्राप्ति।