परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥
parastasmāttu bhāvo'nyo'vyakto'vyaktātsanātanaḥ |yaḥ sa sarveṣu bhūteṣu naśyatsu na vinaśyati ||
परंतु उस अव्यक्त से परे एक और भाव है, जो स्वयं अव्यक्त और सनातन है; सब प्राणियों के नष्ट हो जाने पर भी वह नष्ट नहीं होता।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी बताया कि ब्रह्मा के दिन में सब प्राणी प्रकट होते हैं और रात्रि में अव्यक्त में लीन हो जाते हैं। यहाँ वे उस चक्र से भी परे एक शाश्वत परम सत्ता की ओर संकेत करते हैं, जो सबके लय होने पर भी अक्षुण्ण रहती है। परंपराओं में इसके अर्थ पर भेद है: अद्वैत इसे निराकार ब्रह्म मानता है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे कृष्ण का परम धाम या स्वयं परम पुरुष मानती हैं।