सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥
sarvadvārāṇi saṃyamya mano hṛdi nirudhya ca |mūrdhnyādhāyātmanaḥ prāṇamāsthito yogadhāraṇām ||
शरीर के सभी द्वारों को संयमित करके, मन को हृदय में रोककर, अपने प्राण को मस्तक में स्थापित करके और योग की धारणा में स्थिर होकर…
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि मृत्यु के समय के लिए साधक योग-अभ्यास से कैसे स्वयं को तैयार करता है। यहाँ "द्वार" इंद्रियाँ हैं, जिन्हें विषयों से हटाया जाता है; मन को हृदय में थामा जाता है और प्राण को मस्तक में चढ़ाया जाता है, यह सब योग की धारणा (एकाग्रता) में होता है। यह वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है, जहाँ साधक "ओम्" का उच्चारण करते हुए कृष्ण का स्मरण करता है।