आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥
ābrahmabhuvanāllokāḥ punarāvartino'rjuna |māmupetya tu kaunteya punarjanma na vidyate ||
हे अर्जुन, ब्रह्मलोक तक के सभी लोकों से फिर लौटना पड़ता है; परन्तु हे कुन्तीपुत्र, मुझे पा लेने पर फिर जन्म नहीं होता।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को मृत्यु के बाद की गति समझा रहे हैं। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा का लोक (ब्रह्मलोक) भी जन्म-मरण के चक्र के भीतर है, इसलिए वहाँ से लौटना पड़ता है (पुनरावर्ती)। केवल परम पुरुष कृष्ण को पा लेने पर पुनर्जन्म समाप्त होता है। "मुझे प्राप्त करना" का अर्थ परंपराओं में भिन्न है: भक्ति-परंपराएँ इसे साकार ईश्वर के साथ नित्य मिलन मानती हैं, जबकि अद्वैत इसे ब्रह्म से अपनी एकता जानकर मिलने वाली मुक्ति मानता है।