उसे सब ज्योतियों की भी ज्योति और अंधकार से परे कहा जाता है। वही ज्ञान है, वही जानने योग्य है, और ज्ञान से ही प्राप्त होने वाला है; वह सबके हृदय में स्थित है।
व्याख्या
कृष्ण पिछले श्लोकों में बताए गए ज्ञेय, यानी ब्रह्म या परम सत्य, का वर्णन जारी रखते हैं। वे कहते हैं कि वह सूर्य जैसी ज्योतियों को भी प्रकाशित करता है और अंधकार, अर्थात अज्ञान (तमस्), से परे है। वही ज्ञान, वही ज्ञेय और ज्ञान से प्राप्य है, और सबके हृदय में रहता है। अद्वैत परंपरा इसे सबमें एक ही आत्मा मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे अंतर्यामी ईश्वर के रूप में जीव से भिन्न देखती हैं।