तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ।स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु ॥
tatkṣetraṃ yacca yādṛk ca yadvikāri yataśca yat |sa ca yo yatprabhāvaśca tatsamāsena me śrṛṇu ||
वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, उसमें कौन-से विकार होते हैं और वह किससे उत्पन्न होता है; और वह (क्षेत्रज्ञ) कौन है तथा उसका प्रभाव क्या है, यह सब मुझसे संक्षेप में सुनो।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी क्षेत्र (शरीर और अनुभव का संसार) तथा क्षेत्रज्ञ (उसे जानने वाली चेतन आत्मा) की बात कही है। यहाँ वे संक्षेप में समझाने का वचन देते हैं कि क्षेत्र क्या है, कैसा है, कैसे बदलता है (विकार), कहाँ से आता है, और क्षेत्रज्ञ कौन है तथा उसका प्रभाव क्या है। क्षेत्रज्ञ को परंपराएँ अलग-अलग ढंग से समझती हैं, कहीं जीवात्मा और कहीं परमात्मा के रूप में, पर यह श्लोक केवल विषयों की सूची देता है।