य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैःसह ।सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥
ya evaṃ vetti puruṣaṃ prakṛtiṃ ca guṇaiḥsaha |sarvathā vartamāno'pi na sa bhūyo'bhijāyate ||
जो मनुष्य पुरुष को और गुणों सहित प्रकृति को इस प्रकार जान लेता है, वह हर तरह से जीवन जीते हुए भी फिर जन्म नहीं लेता।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के उपदेश का फल बता रहे हैं। पुरुष चेतन आत्मा है, प्रकृति जड़ जगत का मूल है, और गुण (सत्त्व, रजस् और तमस्) प्रकृति के तीन घटक हैं। इस ज्ञान से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। "हर तरह से जीते हुए भी" का अर्थ अद्वैत परंपरा में यह लिया जाता है कि कर्म प्रकृति के हैं और ज्ञानी उनसे बंधता नहीं, जबकि अन्य परंपराएँ इसे ऐसा ज्ञान मानती हैं जो सही आचरण से अलग नहीं होता।