क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥
kṣetrakṣetrajñayorevamantaraṃ jñānacakṣuṣā |bhūtaprakṛtimokṣaṃ ca ye viduryānti te param ||
जो लोग इस प्रकार ज्ञान की दृष्टि से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को, और प्राणियों की प्रकृति से मुक्ति को जान लेते हैं, वे परम को प्राप्त होते हैं।
व्याख्या
अध्याय 13 के अंत में कृष्ण इसका सार बताते हैं: क्षेत्र (शरीर और प्रकृति) तथा क्षेत्रज्ञ (उसे जानने वाली चेतन आत्मा) के भेद को स्पष्ट देखना। "भूतप्रकृतिमोक्ष" का अर्थ प्राणियों की प्रकृति से मुक्ति भी लिया जाता है और प्रकृति से छूटने का उपाय भी। जो ज्ञान की आँख (ज्ञानचक्षु) से यह देखते हैं, वे परम तत्त्व को पाते हैं।