हे भरतश्रेष्ठ! जो कुछ भी चर या अचर प्राणी उत्पन्न होता है, उसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न हुआ जानो।
व्याख्या
कृष्ण क्षेत्र (शरीर और प्रकृति) तथा क्षेत्रज्ञ (उसे जानने वाली चेतन आत्मा) के विषय में अपना उपदेश आगे बढ़ा रहे हैं। वे कहते हैं कि चलने वाला या स्थिर, हर प्राणी इन दोनों के संयोग से ही अस्तित्व में आता है। इस संयोग के स्वरूप पर परंपराओं में मतभेद है: अद्वैत इसे अज्ञान से हुआ आभासी मेल मानता है, जबकि आस्तिक संप्रदाय इसे ईश्वर पर आश्रित वास्तविक संबंध मानते हैं।