असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥
asaktiranabhiṣvaṅgaḥ putradāragṛhādiṣu |nityaṃ ca samacittatvamiṣṭāniṣṭopapattiṣu ||
पुत्र, पत्नी, घर आदि में आसक्ति और गहरे लगाव का न होना; और मनचाही तथा अनचाही परिस्थितियों के आने पर चित्त का सदा सम बने रहना…
व्याख्या
कृष्ण ज्ञान के लक्षणों की सूची आगे बढ़ा रहे हैं। यहाँ वे परिवार और घर के प्रति अनासक्ति (असक्ति) और अत्यधिक तादात्म्य या लगाव (अनभिष्वङ्ग) के अभाव की बात करते हैं, जिसका अर्थ उनकी उपेक्षा करना नहीं है। साथ ही प्रिय या अप्रिय, दोनों स्थितियों में चित्त का संतुलित रहना (समचित्तत्व) बताया गया है। यह सूची अगले श्लोक में भी जारी रहती है।