प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति ॥
prakṛtyaiva ca karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśaḥ |yaḥ paśyati tathā''tmānamakartāraṃ sa paśyati ||
जो यह देखता है कि सारे कर्म सब प्रकार से केवल प्रकृति द्वारा ही किए जा रहे हैं, और आत्मा अकर्ता है, वही सचमुच देखता है।
व्याख्या
कृष्ण सच्ची दृष्टि का वर्णन जारी रखते हैं। पिछले श्लोक में सर्वत्र समान रूप से स्थित ईश्वर को देखने की बात थी; अब वे कहते हैं कि सारे कर्म प्रकृति (तीन गुणों वाले शरीर-मन के क्षेत्र) के हैं और आत्मा अकर्ता है। अद्वैत परंपरा इसे आत्मा की पूर्ण अक्रियता मानती है, जबकि भक्ति-परंपराएँ कहती हैं कि आत्मा स्वतंत्र कर्ता नहीं है, क्योंकि प्रकृति और ईश्वर उसके माध्यम से कार्य करते हैं।