इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥
indriyārtheṣu vairāgyamanahaṅkāra eva ca |janmamṛtyujarāvyādhiduḥkhadoṣānudarśanam ||
इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य, और अहंकार का अभाव भी; जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और रोग में निहित दुःख-रूपी दोष को बार-बार देखते रहना…
व्याख्या
कृष्ण पिछले श्लोक से शुरू की गई ज्ञान के लक्षणों की सूची जारी रखते हैं। यहाँ वे इन्द्रिय-सुखों के प्रति वैराग्य, अहंकार के अभाव, और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे व रोग से जुड़े दुःख और दोष को निरंतर देखने की बात कहते हैं। अंतिम पद की दो व्याख्याएँ मिलती हैं: कुछ व्याख्याकार इसे इन अवस्थाओं में दुःख को ही दोष मानकर देखना समझते हैं, तो कुछ इनमें दुःख और दोष, दोनों को देखना। दोनों ही स्थितियों में उद्देश्य आसक्ति ढीली करना है, निराशा बढ़ाना नहीं।