जो समस्त प्राणियों में समान रूप से स्थित उस परमेश्वर को देखता है, जो नष्ट होनेवाले प्राणियों के बीच स्वयं नष्ट नहीं होता, वही वास्तव में देखता है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ क्षेत्रज्ञ, यानी हर शरीर के भीतर स्थित चेतन साक्षी, की बात आगे बढ़ा रहे हैं। वे कहते हैं कि सच्ची दृष्टि वही है जो सभी प्राणियों में एक ही परमेश्वर को देखे, जो शरीरों के नष्ट होने पर भी अपरिवर्तित रहता है। अद्वैत परंपरा इसे सब में एक ही आत्मा का दर्शन मानती है, जबकि भक्ति और द्वैत-विशिष्टाद्वैत परंपराएँ इसे हर जीव में अंतर्यामी ईश्वर की उपस्थिति के रूप में समझती हैं।