इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, देह-रूपी संघात, चेतना और धृति (संकल्प की दृढ़ता) — संक्षेप में, अपने विकारों सहित यही क्षेत्र बताया गया है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ "क्षेत्र" (शरीर और अनुभव की वह सारी परिधि जिसे ज्ञाता देखता है) का संक्षिप्त वर्णन पूरा कर रहे हैं। पिछले श्लोक के तत्त्वों, इंद्रियों और मन के बाद वे आंतरिक अवस्थाएँ जोड़ते हैं: इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात (शरीर का समुच्चय), चेतना और धृति (दृढ़ता)। "विकार" का अर्थ है कि ये सब बदलते रहते हैं। यहाँ चेतना को कुछ परंपराएँ मन की एक वृत्ति मानती हैं और कुछ चेतना का मन में प्रतिबिंब, पर सभी इसे क्षेत्र का भाग मानती हैं, ज्ञाता का नहीं।