महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥
mahābhūtānyahaṅkāro buddhiravyaktameva ca |indriyāṇi daśaikaṃ ca pañca cendriyagocarāḥ ||
पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और अव्यक्त; दस इंद्रियाँ और एक मन, तथा इंद्रियों के पाँच विषय…
व्याख्या
श्रीकृष्ण अर्जुन को “क्षेत्र” यानी शरीर और उसके जगत की रचना समझा रहे हैं। यहाँ वे उसके घटक गिनाते हैं: पाँच स्थूल तत्त्व, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (मूल अप्रकट प्रकृति), पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ, मन और शब्द-स्पर्श आदि पाँच विषय। “अव्यक्त” को अधिकतर परंपराएँ मूल प्रकृति मानती हैं, जबकि अद्वैत की व्याख्या इसे माया की अप्रकट अवस्था के रूप में भी समझती है। यह वाक्य अगले श्लोक में आगे चलता है।