ऋषियों ने इसे अनेक प्रकार से गाया है, अलग-अलग वैदिक छंदों में भी, और तर्कयुक्त, सुनिश्चित ब्रह्मसूत्र-पदों में भी।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी क्षेत्र (शरीर और उसकी रचना) और क्षेत्रज्ञ को समझाने का वचन दिया है। यहाँ वे कहते हैं कि यह ज्ञान नया नहीं है; ऋषियों ने इसे विविध वैदिक छंदों में और ब्रह्मसूत्र के तर्कयुक्त, निश्चयात्मक वचनों में कहा है। कुछ टीकाकार 'ब्रह्मसूत्रपद' को उसी नाम का वेदांत-ग्रंथ मानते हैं, जबकि अन्य इसे ब्रह्म का निरूपण करने वाले उपनिषद्-वचनों के अर्थ में लेते हैं।