हे कुन्तीपुत्र! इस शरीर को 'क्षेत्र' कहा जाता है; और जो इसे जानता है, उसे 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं — ऐसा इस तत्त्व के जानकारों का कहना है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में अर्जुन ने प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बारे में पूछा था, और कृष्ण यहाँ उत्तर की शुरुआत करते हैं। 'क्षेत्र' का अर्थ खेत है, यानी शरीर, जिसमें कर्म होते हैं और उनके फल उगते हैं। 'क्षेत्रज्ञ' इसे जानने वाला भीतर का चेतन साक्षी है। अगला श्लोक बताता है कि कृष्ण का इस ज्ञाता से क्या संबंध है।