हे भारत, सभी क्षेत्रों में मुझे ही क्षेत्रज्ञ भी जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में (सच्चा) ज्ञान है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने शरीर को "क्षेत्र" (खेत) और उसे जानने वाले को "क्षेत्रज्ञ" (क्षेत्र को जानने वाला) कहा था। यहाँ वे अर्जुन से कहते हैं कि सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ के रूप में उन्हें ही जानो, और शरीर तथा जानने वाले का यह भेद समझना ही उनके अनुसार सच्चा ज्ञान है। अद्वैत परंपरा इसे जीव और ईश्वर की एकता का संकेत मानती है, जबकि द्वैत और विशिष्टाद्वैत परंपराएँ इसे सभी जीवों में अंतर्यामी रूप से बसे ईश्वर का कथन मानती हैं, जो जीवों से भिन्न रहते हैं।