बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥
bahirantaśca bhūtānāmacaraṃ carameva ca |sūkṣmatvāttadavijñeyaṃ dūrasthaṃ cāntike ca tat ||
वह प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी; वह अचल भी है और चल भी। अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण वह जाना नहीं जा सकता; वह दूर भी स्थित है और निकट भी।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ ज्ञेय (जानने योग्य) परम तत्त्व, ब्रह्म, का वर्णन जारी रखते हैं। बाहर-भीतर, अचल-चल और दूर-निकट जैसे विरोधी जोड़ों से वे बताते हैं कि वह सर्वत्र है और किसी एक वर्णन में बँधा नहीं है। अत्यंत सूक्ष्म (सूक्ष्मत्व) होने से वह साधारण ज्ञान की पकड़ में नहीं आता। व्याख्याएँ भिन्न हैं: अद्वैत इसे सब रूपों के पीछे की एक सत्ता मानता है, जबकि आस्तिक परंपराएँ इसे ईश्वर की व्यापकता और जगत से परे होना भी मानती हैं।