उसके हाथ और पैर सब ओर हैं, उसकी आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, और उसके कान भी सब ओर हैं। वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है।
व्याख्या
कृष्ण पिछले श्लोक में बताए गए ज्ञेय, यानी परम ब्रह्म का वर्णन कर रहे हैं। सब ओर हाथ-पैर, आँख और कान एक अलंकार हैं: किसी भी प्राणी में होने वाले कर्म, गति, दर्शन और श्रवण के पीछे यही एक सत्ता है, जो सबमें व्याप्त है। परंपराओं में अर्थ अलग हैं: अद्वैत इसे सब प्राणियों में प्रकट एक निराकार आत्मा मानता है, जबकि भक्ति-परंपराएँ इसे सर्वव्यापी सगुण भगवान की उपस्थिति मानती हैं।