हे भारत! जैसे एक ही सूर्य इस सारे संसार को प्रकाशित करता है, वैसे ही क्षेत्री (क्षेत्र का स्वामी) सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ क्षेत्रज्ञ (आत्मा) और क्षेत्र (शरीर) के संबंध को समझा रहे हैं। पिछले श्लोक में आत्मा को आकाश की तरह अलिप्त बताया गया था; अब सूर्य का उदाहरण है, जो अकेला पूरे संसार को प्रकाशित करता है, वैसे ही आत्मा चेतना से पूरे शरीर-मन को प्रकाशित करती है। इस आत्मा को अद्वैत एक सर्वव्यापी चेतना मानता है, जबकि विशिष्टाद्वैत और द्वैत परंपराएँ प्रत्येक जीव को अलग और ईश्वर पर आश्रित मानती हैं।