अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥
anāditvānnirguṇatvātparamātmāyamavyayaḥ |śarīrastho'pi kaunteya na karoti na lipyate ||
अनादि होने और गुणों से रहित होने के कारण यह परमात्मा अविनाशी है। हे कुन्तीपुत्र! शरीर में स्थित होते हुए भी यह न कर्म करता है, न उससे लिप्त होता है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि आत्मा शरीर और उसके कर्मों से भिन्न है। आत्मा अनादि है और प्रकृति के तीन गुणों से परे है, इसलिए वह बदलती या नष्ट नहीं होती, और शरीर के कर्म उसे दूषित नहीं करते। "परमात्मा" का अर्थ अद्वैत में जीव की अपनी आत्मा माना जाता है, जबकि भक्ति-परंपराओं में प्रत्येक प्राणी के भीतर रहने वाला ईश्वर।